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QUIZ IN SCHOOL











EDUCATIONAL TOUR 2012-13







OUR 10th TOPPERS 2013



COMPLETE REPORT ON RESULT

     
 
 MATRICULATION RESULT MARCH, 2013

No. of Students appeared:       48

No. of students got through:    47        PASS %age: 97.92%
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No. of first divisions:                34
No. of second divisions:           11
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               No of distinctions in Sanskrit:     26
          No. of distinctions in Drawing:   21
          No. of distinctions in Science:    13
    No of distinctions in Mathematics:  10            
          No. of distinctions in Hindi:       09
    No. of distinctions Social Science:   05
       No. of distinctions in English:       02
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FIRST POSITION: 
Mr Uttkarsh Dhiman    619/700(88.43%)

SECOND POSITION:
Miss Shehnaj       608/700(86.86%)
THIRD POSITION:
Mr Sarvjeet Singh     591/700(84.43%)

NIRJLA EKADASHI WITH STUDENTS







SMC COMMITTEE 2013-14

SMS Responses:............(1) Sh G.L. Nanda Ji (Retired Principal) presented a cheque of Rs Five THOUSAND (5000), (2) Sh Joginder Pal Dhiman (TGT Science from Village Kalruhi and presently posted at GMS Rajpura) donated Rs FIVE THOUSAND (Rs 5000) and Sh Shiv Lal Shiv Goswami contributed Rs TWO THOUSAND and ONE HUNDRED (Rs 2100).
We all (HM,Staff, SMC Members and students) thanks these personalities for their contributions. Every penny matters for us and every contribution plays very important role for the development of our institution. 




Standing Row(L to R): A student, Kewal Singh(Partially seen),Ravi Singh, 
Pushap Deep, Sumesh, Parveen, Ashok Kumar, Aseem Dhiman(HM), 
Sudershan Singh(SMC Pradhan),Deepak Kaundal,Sarla Devi, Monika Devi.
Sitting Row (L to R): Babita, Pawna, Suman, Vijay Kumari, Ravina, Sheela Devi.

पूर्व विद्यार्थियों से आग्रह

राजकीय उच्‍च विद्यालय कलरूही के पूर्व विद्यार्थियों से आग्रह है कि वे अपना विवरण वर्तमान स्थिति और प्रगति के साथ विद्यालय को डाक या ईमेल से प्रेषित करें ताकि विवरण को पाठशाला साईट पर अपलोड किया जा सके। विवरण अपने पासपोर्ट साईज के फोटो के साथ भेजे।
ईमेल पता ghskalruhiuna [AT]gmail[DOT]com
  सम्‍पर्क

माता चर्तुभुजा का प्राचीन मंदिर

हिमाचल प्रदेश को देवी-देवताओं की भूमि कहा जाता है। यहां पर असंख्य देवी-देवताओं के प्राकृतिक व मानव निर्मित मंदिर विद्यमान हैं। ये मंदिर अटूट आस्था रखने वाले हजारों श्रद्धालुओं को प्रतिवर्ष आकर्षित करते हैं। यहां पर कदम-कदम पर घटित होने वाले दैवीय चमत्कार भक्तों के अटूट विश्वास को अक्षुण्ण बनाए हुए है।  जिला मंडी व कांगड़ा घाटी का प्रवेश द्वार  जोगिंद्र नगर से 22 किलोमीटर दूर  सिकंदरधार की सुरम्य चोटी पर समुद्र तल से 6000 फुट की ऊंचाई पर पांडवों द्वारा स्थापित माता चर्तुभुजा का प्राचीन मंदिर दूर-दूर से दिखाई देता है। बताया जाता है कि पांडव अपने वनवास काल में जब यहां से गुजर रहे थे तो माता शेरावाली ने उन्हें इसी चोटी पर दर्शन दिए थे और सर्व कल्याण हेतु उन्हें मंदिर बनाने के लिए कहा था। पांडवों ने पिंडी रूप में माता चर्तुभुजा की स्थापना की थी और मंदिर बना करके पत्थर के बडे़-बड़े चक्कों से छा दिया था।  सन् 1905 के भयंकर भूकंप से इस मंदिर की परिक्रमा ही खंडित हो गई थी, केवल एक गर्भगृह ही बचा था। सन् 1948 में मंडी के राजा जोगिंद्र सेन ने पुनः इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर में माता चर्तुभुजा की भव्य मूर्ति विराजमान है। पिछले कुछ वर्षें से मंदिर कमेटी द्वारा चरणबद्ध ढंग से चलाए जा रहे कार्यों के  क्रियान्वयन से मंदिर की काया ही पलट गई है। वर्ष भर में माता के दरबार में तीन मेले लगते हैं जिसमें पहला मेला बैसाखी को, दूसरा नाग पंचमी को तथा तीसरा मेला लोहड़ी को लगता है। विशेष कर नाग पंचमी पर लगने वाले मेले की अलग शान होती है। लोक कथा के अनुसार मंडी के पधर के घोघरघार के मैदान में प्राचीन काल से देवताओं और डायनों के बीच एक सप्ताह तक चलने वाले भयंकर युद्ध के हार-जीत के परिणाम पूजारी के आवेश के जरिए अभिव्यक्त होती है। यह परंपरा आज भी जारी है। जो माता की अटूट आस्था के चमत्कार को स्पष्टतया अभिव्यक्त करता है। नवरात्रों में स्थानीय श्रद्धालुओं के अलावा विदेशी पर्यटकों का भारी सैलाब उमड़ता है। श्रद्धालु अपने जीवन की मनोकामनाओं को फलित करवाने हेतु मन्नते मांगते हैं तथा पूरी होने पर परिवार सहित बैंड बाजे के साथ जातरें लाते हैं। रात्रि को जागरण करते हैं। श्रद्धालुओं के रात्रि ठहराव के लिए मंदिर कमेटी द्वारा सरायों की व्यवस्था की गई है। यहां मंदिर परिसपर में भंडारे लगाने के लिए बर्तन, रसोईघर, पानी, बिजली आदि की समुचित व्यवस्था है। निःसंतान दंपत्तियों के लिए यहां संतान प्राप्त करने का एक अजूबा है। नवरात्रों में निःसंतान स्त्रियां माता के दरबार में मौन जागरण करती हैं। यह क्रम तब तक जारी रहता है,जब तक कि माता चर्तुभुजा उनके स्वप्न में स्वयंफल न दे दें। निःसंदेह गोदें भर जाती हैं। जिन भक्तों की आंखों की रोशनी चली जाती है, वे माता चर्तुभुजा से अपनी आंखों की रोशनी के लिए चांदी की आंखे चढ़ाने के लिए मन्नत मांगते हैं तथा आंख की रोशनी पुनः प्राप्त होने पर चांदी की आंखें चढ़ाते हैं। 
- गोपाल राणा, मंडी
साभार दिव्‍य हिमाचल

बाघ की वापसी

विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि  भाषा विभाग के
 निदेशक राकेश कंवर, (बीच में)  'उत्स'  के अध्यक्ष तुलरी रमण(दाएँ ), 
बाएँ से अरुण भारती एवम अवतार एनगिल 
'बाघ की वापसी' का टाईटल पेज 
सात जनवरी 2013 को गेयटी थियेटर में फिर रंग भर गए। ये रंग कविता और कहानियों के रंग थे। मौका था, वरिष्ठ साहित्य्कार अवतार एनगिल के काव्य संग्रह ‘बाघ की वापसी’ और कहानीकार अरुण भारती के कहानी संग्रह ‘अच्छे लोग-बुरे लोग’ का विमोचन। ‘उत्स’ संस्था इस आयोजन में सारथी बनी और तुलसी रमण को आयोजक के रूप में देखा गया। भाषा विभाग के निदेशक, राकेश कंवर इस मौके पर मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद थे। उपस्थित कवि मण्डली में शिमला और इसके दुर्गम क्षेत्रों से आए साहित्यकार सभागार में विराजमान थे। विधिवत विमोचन हुआ और फिर अरुण भारती ने अपनी कहानी पढ़ी, इसके बाद अवतार एनगिल से भी कुछ कविताएँ पढ़वाई गईं। लेकिन बहुत से लेखक चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाए, कारण समय का अभाव बताया गया और आनन-फानन में आयोजन निपटा लिया गया।  अवतार एनगिल और अरुण भारती की कविताओं और कहानियों पर  लेखकों की ओर से कोई टिप्पणी नहीं आ सकीं।  बहुत से लेखकों के पर्चु शिमला के माईनस तापमान की ठंडी के बीच जेब से बाहर आने में कतराते रहे ।
  यद्यपि मंच संचालन कर रहे तुलसी रमण ने उदघोषणा भी की कि यदि कोई बोलना चाहे तो बात कर सकता है,  लेकिन संकोच की ठंड से सभी के जिस्म कुर्सियों पर ही जमे रहे, इस तरह  कुछ लेखक कॉफी पीकर लौट गए और कुछ बिना कॉफी पीए तितर-बितर हो गए। इस आयोजन में अवतार की कविताओं ने गर्मी का माहौल बनाने में कसर नहीं छोड़ी, इसी से प्रभावित कुछ साहित्यिक मित्र संग्रह खरीदकर भी ले गए। अरुण भारती के कहानी संग्रह पर अलग से बात की जाएगी, अभी अवतार एनगिल के संग्रह पर बात-चीत करते हैं। 
                                           
                             अवतार एनगिल एक अर्से से कविता लिख रहे हैं और ‘बाघ की वापसी’ उनका छठा काव्य संग्रह है।  इस ताज़ा संग्रह में उनके  भीतर का कवि उन्हीं तेवरों में नज़र आता है, जिनमें कई बर्ष पहले था। अवतार एनगिल की दाढ़ी का रंग भले ही सफेद हो गया है, उनकी उम्र के हिसाब से लोग उन्हें बुज़ुर्ग कवि कह देते हों, लेकिन उनकी कविताएँ वैसी ही हैं,  हरी की हरी। 49 कविताओं के इस संग्रह में एक के बाद एक कविता ऐसी लय पैता करती है, कि पूरा संग्रह पढ़े बगैर रहा नहीं जाता। 

"सुबह की ओस में
निकल चला
अपने खोल से
एक परिंदा
और
चुटकी भर धूप ने
सहला दिए
उसके पंख।"

विमोचन समारोह में प्रतिभागी लेखक 
                                छोटी कविता का बड़ा जादू क्या होता है, यह इस कविता को पढ़ने के बाद बखूबी अहसास हो जाता है। बच्चे स्कूल किस तरह जाते हैं और घर किस तरह आते हैं इसे अवतार एनगिल ने कुछ ऐसे देखा:- 





“ नन्हें बच्चे
चलकर पहुँचते हैं स्कूल
मगर
छुट्टी होते ही
घर के लिए भागते हैं
आओ !
हम कोई ऐसा खेल रचें
कि बच्चे भागते हुए स्कूल आएँ
और चल कर घर जाएँ।" 


                                       जिस संघर्ष के बीचों-बीच अवतार एनगिल रहे हैं, वहीं से उन्होंने कविता भी की है। उनकी कविताएँ उनके जीवन का दर्शन भी कराती हैं। अवतार ने कविता में खुद को उसी रूप में रखा जिस रूप में वे पर्दे के पीछे दिखते हैं। उनकी कुछ पंक्तियाँ ऐसा अनुभव कराती हैं :-

" जाने कितनी बार
बसों रेल गाड़ियों में यात्रा करते
हम गंतव्य से आगे निकल गए
कितनी बार तेज़ वाहनों से बचते-बचाते
कुचले जाने से बच निकले हम...
.....जाने कितनी बार
बुरी तरह हारकर
कभी शानदार जीतकर
पिटकर या पीटकर
कभी लदे-फदे
कभी खाली हाथ
कभी खुश
कभी उदास
अपने इस द्वार तक
लौटे हम ।"

एक क्षण उनकी कविता एक लय पैदा करती है, तो दूसरे ही क्षण व्यंग्य बाण चला कर मूर्छित करती है

"महारात्रि उत्वस घर की
महानृत्य का पावन अवसर
नाच रहे थे सभी भक्त-जन
...मैं भी नाचा
नाचा ! नाचा ! नाचा ! नाचा !

हाथ पकड़कर उन संतों के
तभी जो देखा, अपने बायें
तभी जो देखा, अपने दायें
नाच रहे थे
नकटे.... नकटे....नकटे....नकटे !
बाबा की भी नाक नहीं थी !

तभी अचानक
देखा अपना हाथ उठाकर
तब यह जाना
                         मेरी अपनी नाक नदारद !
   

उनकी एक छोटी कविता कितनी खुलती है ज़रा देखिए:

" खण्डित पिंजरे में
कोई कंपन नहीं
जोगिया !
आ गए तुम !
चलें ?"
                                      
                                 उनकी कविताओं में तिब्बत के निर्वासन की पीड़ा भी है,और पशु-पक्षियों के दुःख़-दर्द को महसूस करने की संवेदना भी, उसी संवेदना से वो कविता का ऐसा जाल बुनते हैं कि उनके जाल में पाठक आकर फंस जाता है और फड़फड़ाता रहता है। पुराने दिनों को कवि आज भी नहीं भूल पाता और माँ से कुछ  इस तरह बात करता है:-

" मैं मां से बार-बार कहता
पास वाले वन में एक बाँसुरी
निरंतर बजा करती है
माँ कहती-
बाँसुरी नहीं, बजते हैं कान तेरे!"

                                   समय के साथ अवतार एनगिल ऐसी कड़ी बन चलते हैं, कि न पिछला कुछ भूलना चाहते हैं और न ही अगले को नकारते हैं। अपने आपको अपडेट करते हुए वो यूट्यूब पर भी घूम आते हैं, लेकिन चौरसिया की बाँसुरी उन्हें वहाँ भी नज़र आ जाती है। हिन्दी साहित्य ने इंटरनैट के प्रति जो उदासीनता अब तक दिखाई है, अवतार एनगिल उस पंक्ति के कवियों और साहित्यकारों में नहीं आते । उनकी ये पंक्तियाँ इस पर मुहर लगाती हैं:- 

" इन दिनों
धूप और छाया का विज्ञान
मुझे अक्लमंद बंना गया है
पास वाला वन
नहीं, अब कहीं
...
यू ट्यूब पर सुनता हूँ
चौरसिया की बाँसुरी ।" 

                                    पहाड़ों पर कम होती बर्फ और धूप के लिए तरसते घर, प्रवासी पक्षियों का आना-जाना,  अवतार की नज़र हर तरफ रहती है। फूल नदी, जल,  सभी को हम खो रहे हैं,  तो अवतार एनगिल उन्हें तलाश करते नज़र आते हैं। पहाड़ों में बहने वाली छोटी- बड़ी नदियों-नालों का पानी हमने किस तरह शहरों की ओर मोड़ दिया है और किस तरह बाँध बना नदियों को निगल दिया है, इस का चित्रण अवतार की कविताओं में नज़र आता है और इसके दुष्परिणामों को कैंसर रोग का बिंब देकर उनकी कविताएँ हमें आगाह किए बगैर भी नहीं रहतीं।
उनकी कविता की कुछ ऐसी ही पंक्तियाँ हैं :


" जब आदमी नहीं माना
पानी नाराज़ हो गया
और.... खतरे के निशान से ऊपर बहने लगा
बहु-बेटियों की कोख़ में लगे गलने भ्रूण
ढौर-डांगर की चमड़ी लगी सड़ने
आदमी की छुअन से लगे रोगों से
जब पानी आया
धंस गया पीपल का पेड़ तिरछा होकर
इमामबाड़े की ईंटों में
बेघर हुए :

अल्हा रखा, भाई भगवान सिंह, पीटर पाल
पानी ने किसी खुदा का लिहाज़ नहीं किया ।"

                          अवतार एनगिल शिमला में रहे और और शिमला से उनका स्नेह उनकी कविता में साफ छलकता है । शिमला में स्कूल के दिनों से आज-तक को उन्होंने इस अन्दाज़ से पिरोया है, कि जो भी शिमला पर उनकी ये कविताएँ पढें, दीवाना हो जाए। उनकी नज़रों में शिमला एक जादुई शहर है, अगर यहाँ से किसी ने  भागना भी चाहा, तो देवदारुओं ने उसे अपनी बाहों में भीँच लिया, शिमला का बन्दर उन्हें पहली नज़र में अरस्तु लगता है, लेकिन हाथ से लिफाफा लपकते ही पता चलता है कि वह तो शिमला का बिग़ड़ैल बन्दर है । यहाँ अपने सपने सच करने आए बच्चे भी अवतार की नज़र से नहीं बचते और कवि को तब निराशा होती है, जब शिमला के घर द्वार इन बच्चों के लिए एक सपना ही बन कर रह जाते हैं ।
                                 इन बच्चों के बारे में बे कहते हैं कि :

"सपने तो लिए
उन्होंने पकड़
फिर भी
शिमला की छतें
घर-द्वार
उनके सपनों में बसे रहे।"

                             वहीं अवतार ने शिमला शहर को एक ऐसे जादुई शहर के रूप में देखा है, जहाँ बरसों पुराने मित्र अचानक आकर मिल जाते हैं। शिमला पर उनकी एक और कविता देखिए:

"थका हारा
बनवासी ईश्वर
यदि कहीं
कभी
लौटकर आएगा
तो इसी शहर के
किसी देवदार तले
पनाह पाएगा।"

                            इस कविता से अवतार एनगिल के कवि का एक और रूप झलकता है:

" हे दर्पण !
सभी कहते हैं
तुम झूठ नहीं बोलते
फिर भला
दायें को बायाँ
बायें को दायाँ
क्यों बताते हो ?" 

कविता पाठ करते अवतार एनगिल
संग्रह में दर्पण पर उनकी और कविताएँ भी ध्यान खीँचती हैं।

                चार खण्डों के इस कविता संग्रह का टाईटल खण्ड ‘बाघ की वापसी’ पढ़ने योग्य है। इस खण्ड को पढ़कर हाल ही में दिल्ली में हुए  गैंग रेप की वीभत्स तस्वीर तो सामने आती ही हैं, साथ ही साथ हमारी व्यवस्था पर भी बाघ के ज़रिये कवि ने व्यंग्य बाण छोड़े हैं। अवतार एनगिल की कविता का असली रंग इन कविताओं को पढ़कर ही चढता है। 
                         
                       बाघ पर उनकी ये पंक्तियाँ देखें:

" तीसरे पहर की प्रखर धूप में
कालेज से लौटती लड़की
बेहद त्रस्त है

उसे लगता है
उसका ‘भगवान जी’ भी
बाघों से डर गया है
जाने कहाँ प्रवास कर गया है

और...
सारा बाज़ार बाघों से भर गया है
सारा बाज़ार बाघों से भर गया है।"

                       उनकी बाघ पर एक और कविता की पंक्तियाँ कुछ इस 
 तरह है:

" बाघ ने मेमने से कहा :
पह्ले मेरे अगले पंजे बांध दो
फिर मीडिया वालों को फोन लगाओ
आज, हम-तुम
संग-संग फोटो खिंचवाएँगे
सभी चैनलों वाले
उसे दिखाएँगे ।

                       ग़ज़ाला शीर्षक से प्रकाशित उनकी कविता तो मानो दिल्ली में हाल ही के दर्दनाक गैंगरेप का बखान करती हो,यद्यपि यह कविता घटना के कई दिनों पहले लिखी गई है। कविता कुछ यूँ है :

कल :
सुन्दरवन में
तीन शेरों ने
एक मृगी को धर-दबोचा
और सिंहनाद किया
आज :
राजधानी के राजपथ पर चलती ग़ज़ाला
आखिरी बार
उस लम्बी गाड़ी के निकट से निकलती देखी गई
पुलिस को
अभी तक
शेर सिंह, शेर खाँ और शैरी टाईगर की तलाश है।

                          अवतार एनगिल का कविता संग्रह पढ़ते- पढ़ते, शिमला की सर्द हवाएँ गर्म हो गईं, मैं किताब सिरहाने रख सोने लगा हूँ.... अरे... सुबह के तीन बज गए हैं.... ! 

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              'बाघ की वापसी' कविता संग्रह प्राप्त करने के लिए नीचे दी गई मेल पर संपर्क करें:

indirathakursml@gmail.com.

पुस्तक का मूल्य : हार्ड बाऊँड = 150 रुपये
                            पेपर बैक =   100 रुपये 

डाक खर्च 50 रुपये अतिरिक्त । 

एनाकॉन्डा



एनाकॉन्डा कहते ही आंखों के सामने एक विशालकाय सांप की तस्वीर उभर आती है। यह सच है कि एनाकॉन्डा विश्व के सबसे बड़े और खतरनाक सांपों में से एक हैं। कैसे? ठीक बात है भाई, यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए। तो चलिए, चलते हैं दक्षिण अमेरिका के जंगलों में और ढूंढते हैं एनाकॉन्डा को..
लीजिए, पहुंच गए अमेज़ॉन के ज़ंगलों में। अब ढूंढिए एनाकॉन्डा। लेकिन यह इतना आसान नहीं। यह सांप बड़े होते हैं, बहुत ही ज्यादा बड़े लेकिन छुपे रहते हैं। इनसे दोस्ताना व्यवहार की उम्मीद तो नहीं कर रहे थे न आप। जी, ऐसा बिलकुल मत कीजिएगा। मैत्री भाव नहीं रखते यह सांप। एनाकॉन्डा खुद को छुपाने में माहिर होते हैं और पानी या दलीदली इलाके में अपनी खाल के अनुरूप पृष्ठभूमि ढूंढकर छुप जाते हैं। नदियां, झील आदि के पास ही मिलते हैं यह। और जैसे ही खतरा दिखता है, तुरंत पानी में गए और छूमंतर।
वैसे यह सब कहने की बात होगी क्योंकि एक तो क्या खतरा आएगा एक 20 फुट लम्बे और तकरीबन 150 किलो वज़नी सांप पर। और चलो, भूले-भटके आ भी गया कोई हम जैसा इंसानी खतरा, तो यूं तो 20 फुटे जनाब सर्रर्र से सरक नहीं जाएंगे। दिख गए, तो हमें डरने का पूरा मौका देंगे। क्यों, ठीक है न? इतना बड़ा सांप, जो अब तक तो दिख नहीं रहा था, पर अचानक दिखे और वह भी इस तरह सरकता हुआ, तो डर तो लगेगा ही भई।
चलिए, जब तक बाकायदा नहीं दिखते, तब तक थोड़ा परिचय ले लेते हैं श्रीमान एनाकॉन्डा का। ये सांप होते हैं बोआ परिवार के। इसी परिवार में अजगर भी आते हैं। अब समझे, सारे विशालकाय एक ही परिवार में आ जमे हैं।
इनका नाम एनाकॉन्डा क्यों है, क्या मायने होते हैं इसके, यह पूरी तरह से समझ में नहीं आया है। अरे हमें नहीं भाई, वैज्ञानिकों को। इसका मूल एशिया में मिलता दिखाई देता है। कुछ शोध करने वालों ने कहा कि एनाकॉन्डा सिंहली भाषा के किसी शब्द से बना है। तो कुछ का कहना है कि यह तमिल भाषा के शब्द अनाएकोंदरण से बना है, जिसका मतलब होता है हाथी को भी मार गिराने वाला। हूं..यह कुछ ठीक भी लगता है, है न।
वैसे आपको पता है न कि सिंहली भाषा श्रीलंका की आधिकारिक भाषा है। तभी तो कहा कि एनाकॉन्डा नाम का मूल एशिया में मिलता दिखता है।इतना तो ढूंढ लिया, अब तक दिखा नहीं न आपको एनाकॉन्डा? अब क्या अर्जेटीना तक चलें? येलो एनाकॉन्डा कभी-कभी इतने दक्षिण तक भी चले जाते हैं। इनकी बात तो यूं भी अलग है। ये दुनिया के सबसे बड़े सांप होने का गौरव रखते हैं। इनकी लम्बाई होती है 30 फुट और वज़न 227 किलो। बाबा रे!!
लगता है अमेज़ॉन से निराश होकर लौटना पड़ेगा। वैसे दुखी मत होइए, यह सांप वैज्ञानिकों को शोध करने के लिए नहीं मिलता, तो आपको देखने के लिए इतनी आसानी से कैसे मिलेगा। चलते-चलते यह जान लेते हैं कि यह एनाकॉन्डा फिल्म की वजह से मशहूर हुए हैं, या कोई सचमुच खास बात है इनमें।
खास बात यह है कि जैसा कि बताया था एनाकॉन्डा ज़हरीले नहीं होते। पर होते खतरनाक हैं। अपने शिकार को यह शरीर की कुंडली बनाकर उसमें फंसा लेते हैं। फिर कुंडली का शिकंजा तब तक कसते जाते हैं, जब तक कि शिकार दम न तोड़ दे।
ओह, कितना डरवना है यह सब।मादा एनाकॉन्डा अंडे नहीं, संपोलों को जन्म देती है। एक बार में 25-30 छुटके एनाकॉन्डा जन्म लेते हैं। और जन्म के बाद उन्हें किसी ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं होते। ये बेबी, बाबा एनाकॉन्डा भोजन ढूंढने और छुपने आदि के गुर पहले से ही जानते हैं।वैसे कहते हैं बोआ परिवार के सदस्यों के रंग बड़े सुंदर होते हैं।चलिए, इस रंगों वाली बात के साथ वापस चलते हैं। विदा अमेजॉन।

मां भगयाणी मन्दिर

ज़िला सिरमौर के हरिपुरधार में स्थित मां भगयाणी मन्दिर समुद्रतल से आठ हज़ार की ऊंचाई पर बनाया गया है! यह मन्दिर उतरी भारत का प्रसिद्ध मन्दिर है! यह मन्दिर कई दशकों से श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र बना हुअ है! वैसे तो यहां वर्ष भर भक्तों का आगमन रहता है परन्तु नवरात्रों और संक्राति में भक्तों की ज्यादा श्रद्धा रहती है! इसका पौराणिक इतिहास श्रीगुल महादेव से की दिल्ली यात्रा से जुडा है जहां तत्कालीन शासक ने उन्हे उनकी दिव्यशक्तियों के कारण चमडे की बेडियों में बांध बन्दी बना लिया था और दर्वार में कार्यरत माता भगयाणी ने श्रीगुल को आज़ाद करने में सहायता की थी! इस कारण श्रीगुल ने माता भगयाणी को अपनी धरम बहन बनाया और हरिपुरधार मेंस्थान प्रदान कर सर्वशक्तिमान का वरदान दिया! आपार प्राकृतिक सुन्दरता के मध्य बना यह मन्दिर आस्था का प्रमुख स्थल है!  बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिये मन्दिर समिति ने ठहरने का प्रबन्ध किया हुआ है! हरिपुरधार  शिमला से वाया सोलन राजगढ एक सौ पचास किलोमीटर दूर है! जबकि चण्डीगढ से १७५ किलोमीटर है! हरिपुरधार के लिये देहरादून से भी यात्रा की जा सकती है

तानु जुब्बढ़ झील

शिमला जिला में नारकंडा ब्लाक के तहत ग्राम पंचायत जरोल में स्थित तानु जुब्बढ़ झील एक सुंदर पर्यटक स्थल है। यहाँ नाग देवता का प्राचीन मन्दिर हैं ! यह झील नारकंडा से 9 किलो मीटर दूर समुद्रतल से 2349 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है ! इस झील का एक पुरातन इतिहास रहा है ! इतनी ऊंचाई पर समतल मैदान के बीचो बीच आधा किलोमीटर के दायरे लबालब पानी से भरी इस झीलं को देख कर हर कोई सोच में पड़ जाता है ! जुब्बढ़ का स्थानीय भाषा में अभिप्राय है घास का मैदान ! इस झील की खोज का श्रेय उन भेड़ बकरी पलकों को जाता है जो यहाँ भेड़ और बकरियों को यहाँ चराने आते थे ! समतल मैदान होने के कारण इन पशु पालकों ने यहाँ पर खेती करने की सोची ! खेती करते समय उन पशु पालकों को यहाँ ठंडे इलाके के बाबजूद सांप नज़र आते थे ! वे उन साँपों को मरने का प्रयास करते तो वो वही पर लुप्त हो जाते थे ! इतना होने पर भी वे पशु पालक वहां पर खेती करते रहे ! एक दिन खेती करते समय एकाएक 18 जोड़ी बैल मैदान के मध्य छिद्र हो जाने से वहा उत्पन हुई जलधारा में समां गए ! इस जलधारा से मैदान पानी से पूरा भर गया ! मान्यता है की इस दृश्य को देखने वाले अभी हैरान परेशां ही थे की वहा नाग देवता जी की प्रतिमा उभर आई ! लोगों ने इसे देव चमत्कार मानते हुए नाग देवता की स्थापना यहाँ कर दी ! आज भी नाग देवता का मंदिर यहाँ पर आलोकिक है और लोगो में बेहद मान्यता है ! 
उस समय उस चमत्कार में गायब हुए चरवाहे औए बैल सैंज के समीप केपु गाँव में निकले ! यह सब केसे हुआ इसे देव चमत्कार ही माना जाता है !इसके प्रमाण आज भी केपु के मंदिर में देखे जा सकते है !
हर वर्ष यहाँ पर मई मास में 31तारीख के आस पास मेले का आयोजन किया जाता है जो की लगभग तीन दिनों तक चलता है इस मेले में चतुर्मुखी देवता मेलन मेले की शोभा बढाते है ! इस मेले में दूर दूर से श्रद्धालु दर्शनों के लिए आते है ! स्थानीय स्थाई निवासी इस मेले में ज़रूर शिरकत करते है। झील के चारो ओर देवदार के वृक्ष इस स्थल की सुन्दरता को और भी बढ़ा देते है ! ठंडी ठंडी हवा वातावरण को और भी सुहावना बना देती है ! इस मेले में खेल कूद प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है जिसमें वोल्ली बाल क्रिकेट इत्यादि प्रतियोगिता प्रमुख है !
कुछ भी कहा जाये परन्तु आज भी पुरातन काल में हुए इन चमत्कारों के प्रमाणों को देख कर लोग चकित रह जाते है ! इस क्षेत्र का प्राकृतिक सोंदर्य अद्भुत तो है ही और पर्यटकों को आकर्षित भी करता है ! आवश्यकता है इस क्षेत्र को और अधिक विकसित करने की क्योंकि यहाँ पर्यटन की आपार संभावनाएं है !

भारत का हिंदी लघुकथा संसार

लघुकथा वर्तमान में  साहित्य में एक सशक्त विधा के रूप में स्थापित है! आम पाठक की रूचि लघुकथाओ में बनी है ! लघु कथाओं को लेकर कई पुस्तके बाज़ार में आ रही है ! मुझे स्वयं लघुकथाओं में रूचि है तो इससे जुढ़ी पुस्तके पढ़ता रहता हू ! इस मध्य डा० राम कुमार घोटड  की पुस्तक भारत का हिंदी लघुकथा संसार आई है जिसमे १२ राज्यों के लघुकथा लेखन पर प्रकाश डाला गया है !  डॉ० घोटड एम् बी बी एस , एम् एस है और आज कल राजस्थान चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत है ! इस पुस्तक में राजस्थान  डा० राम कुमार घोटड, बिहार -सतीशराज पुष्करणा- रामयतन प्रसाद यादव  , मध्य प्रदेश -मालती बसंत  , हरियाणा - प्रो रूप देवगुण  , उत्तर प्रदेश - रामेश्वर कम्बोज हिमांशु , दिल्ली - हरनाम शर्मा , झारखण्ड-डा अमर नाथ चौधरी अब्ज , छतीसगढ़ -डा राजेंदर सोनी , हिमाचल प्रदेश- रतन चंद  रत्नेश  , पंजाब- श्याम सुन्दर अगरवाल , गुजरात- प्रो मुकेश रावल  और  महाराष्ट्र-  डा० राम कुमार घोटड ने इन  राज्यों में लघुकथा लेखन पर प्रकाश डाला  है ! इसके अलावा हिंदी लघुकथा के इतिहास पर महत्त्व पूर्ण आलेख है ! इस पुस्तक की विशेषता है की इसमे उन ४३ लोगो के नाम दिए गए है जिन्होंने हिंदी लघुकथाओ  पर पी एच डी और एम् फिल की उपाधि प्राप्त की है ! १६३ पृष्ठों  की यह पुस्तक पाठको  के लिए बेहद ही लाभप्रद है ! साहित्यागार , जयपुर द्वारा प्रकशित इस पुस्तक की छपाई सुन्दर है तथा मुद्रण में  गलतिया नहीं है !  पुस्तक प्राप्त करने वाले इच्छुक  डा० राम कुमार घोटड से सादलपुर ( राजगढ़ ), जिला चुरू राजस्थान ३३१०२३ फोन ०१५५९ २२४१०० निवास मोबाइल ०९४१४०८६८०० पर संपर्क कर सकते है !