हिमाचल प्रदेश को देवी-देवताओं की भूमि कहा जाता है। यहां पर असंख्य देवी-देवताओं के प्राकृतिक व मानव निर्मित मंदिर विद्यमान हैं। ये मंदिर अटूट आस्था रखने वाले हजारों श्रद्धालुओं को प्रतिवर्ष आकर्षित करते हैं। यहां पर कदम-कदम पर घटित होने वाले दैवीय चमत्कार भक्तों के अटूट विश्वास को अक्षुण्ण बनाए हुए है। जिला मंडी व कांगड़ा घाटी का प्रवेश द्वार जोगिंद्र नगर से 22 किलोमीटर दूर सिकंदरधार की सुरम्य चोटी पर समुद्र तल से 6000 फुट की ऊंचाई पर पांडवों द्वारा स्थापित माता चर्तुभुजा का प्राचीन मंदिर दूर-दूर से दिखाई देता है। बताया जाता है कि पांडव अपने वनवास काल में जब यहां से गुजर रहे थे तो माता शेरावाली ने उन्हें इसी चोटी पर दर्शन दिए थे और सर्व कल्याण हेतु उन्हें मंदिर बनाने के लिए कहा था। पांडवों ने पिंडी रूप में माता चर्तुभुजा की स्थापना की थी और मंदिर बना करके पत्थर के बडे़-बड़े चक्कों से छा दिया था। सन् 1905 के भयंकर भूकंप से इस मंदिर की परिक्रमा ही खंडित हो गई थी, केवल एक गर्भगृह ही बचा था। सन् 1948 में मंडी के राजा जोगिंद्र सेन ने पुनः इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर में माता चर्तुभुजा की भव्य मूर्ति विराजमान है। पिछले कुछ वर्षें से मंदिर कमेटी द्वारा चरणबद्ध ढंग से चलाए जा रहे कार्यों के क्रियान्वयन से मंदिर की काया ही पलट गई है। वर्ष भर में माता के दरबार में तीन मेले लगते हैं जिसमें पहला मेला बैसाखी को, दूसरा नाग पंचमी को तथा तीसरा मेला लोहड़ी को लगता है। विशेष कर नाग पंचमी पर लगने वाले मेले की अलग शान होती है। लोक कथा के अनुसार मंडी के पधर के घोघरघार के मैदान में प्राचीन काल से देवताओं और डायनों के बीच एक सप्ताह तक चलने वाले भयंकर युद्ध के हार-जीत के परिणाम पूजारी के आवेश के जरिए अभिव्यक्त होती है। यह परंपरा आज भी जारी है। जो माता की अटूट आस्था के चमत्कार को स्पष्टतया अभिव्यक्त करता है। नवरात्रों में स्थानीय श्रद्धालुओं के अलावा विदेशी पर्यटकों का भारी सैलाब उमड़ता है। श्रद्धालु अपने जीवन की मनोकामनाओं को फलित करवाने हेतु मन्नते मांगते हैं तथा पूरी होने पर परिवार सहित बैंड बाजे के साथ जातरें लाते हैं। रात्रि को जागरण करते हैं। श्रद्धालुओं के रात्रि ठहराव के लिए मंदिर कमेटी द्वारा सरायों की व्यवस्था की गई है। यहां मंदिर परिसपर में भंडारे लगाने के लिए बर्तन, रसोईघर, पानी, बिजली आदि की समुचित व्यवस्था है। निःसंतान दंपत्तियों के लिए यहां संतान प्राप्त करने का एक अजूबा है। नवरात्रों में निःसंतान स्त्रियां माता के दरबार में मौन जागरण करती हैं। यह क्रम तब तक जारी रहता है,जब तक कि माता चर्तुभुजा उनके स्वप्न में स्वयंफल न दे दें। निःसंदेह गोदें भर जाती हैं। जिन भक्तों की आंखों की रोशनी चली जाती है, वे माता चर्तुभुजा से अपनी आंखों की रोशनी के लिए चांदी की आंखे चढ़ाने के लिए मन्नत मांगते हैं तथा आंख की रोशनी पुनः प्राप्त होने पर चांदी की आंखें चढ़ाते हैं।
माता चर्तुभुजा का प्राचीन मंदिर
Posted by :हिमशिक्षा
ON
18:23
No comments
No comments
आप अपनी रचनाएं / लेख इस मेल पर विचारार्थ भेज सकते हैं


0 टिप्पणियाँ:
Post a Comment